देश को देश ही रहने दो…

March 24, 2019 by Manju Mishra      .. देश मेरी तुम्हारी या किसी की जागीर नहीं है देश कागज पर कोई खींचीं हुई लकीर नहीं है  देश न ही कुछ मुट्ठी भर लोगों की विरासत है देश न ही केवल और केवल बस सियासत है .. देश वो मिटटी है जो गढ़ती है हमें रचती है  देश वो खुश्बू है जो… Continue reading देश को देश ही रहने दो…

लाई फिर इक लग़्ज़िशे-मस्ताना तेरे शहर में – कैफ़ि आज़मी

कैफ़ि आज़मीउर्दू शायरी,कैफ़ि आज़मी April 26, 2019 0 Minutes लाई फिर इक लग़्ज़िशे-मस्ताना तेरे शहर में ।फिर बनेंगी मस्जिदें मयख़ाना तेरे शहर में । आज फिर टूटेंगी तेरे घर की नाज़ुक खिड़कियाँआज फिर देखा गया दीवाना तेरे शहर में । जुर्म है तेरी गली से सर झुकाकर लौटनाकुफ़्र है पथराव से घबराना तेरे शहर में । शाहनामे लिक्खे हैं खंडरात… Continue reading लाई फिर इक लग़्ज़िशे-मस्ताना तेरे शहर में – कैफ़ि आज़मी

दर्द अपनाता है पराए कौन – जावेद अख़्तर

जावेद अख़्तरजावेद अख़्तर,हिंदी कविताएँ February 10, 2019 0 Minutes दर्द अपनाता है पराए कौनकौन सुनता है और सुनाए कौन कौन दोहराए वो पुरानी बातग़म अभी सोया है जगाए कौन वो जो अपने हैं क्या वो अपने हैंकौन दुख झेले आज़माए कौन अब सुकूँ है तो भूलने में हैलेकिन उस शख़्स को भुलाए कौन आज फिर दिल है… Continue reading दर्द अपनाता है पराए कौन – जावेद अख़्तर

साँझ हुई परदेस में – विकाश कुमार

VIKASH KUMARअतिथि लेखक,उर्दू शायरी,हिंदी कविताएँ February 11, 2019 0 Minutes फ़रवरी 2019 में न्यू यॉर्क के एक होटेल के कमरे से मैंने ज़िंदगी की जदोजहद को शब्दों में पिरोने की कोशिश की । आशा है आपको पसंद आएगी ।  साँझ हुई परदेस मेंदिल देश में डूब गयाअब इस भागदौड़ सेजी अपना ऊब गया वरदान मिलने की चाह… Continue reading साँझ हुई परदेस में – विकाश कुमार

ये सड़कें – ज्ञान प्रकाश सिंह

2 नव कविबाल कविताएँहिंदीहिंदी कविता अट्ठाइस चक्के वाले ट्रकचलते सड़कों के सीने परएक साथ बहुतेरे आतेहैं दहाड़तेरौंदा करतेतब चिल्लाती हैं ये सड़केंऔर कभी जबअट्ठहास करते बुलडोजरदौड़ लगाते उनके ऊपरतब चीखा करती हैं सड़केंकितना सहती हैंये सड़कें।X X Xसड़क किनारे रहने वालेएवंयात्रा करने वालेसड़ी गली मलयुक्त गन्दगीकरते रहते हैं सड़कों परऔर जानवरकरते गोबरमैला भर देते हैं… Continue reading ये सड़कें – ज्ञान प्रकाश सिंह

लेन-देन – रामधारी सिंह ‘दिनकर’

लेन-देन का हिसाबलंबा और पुराना है। जिनका कर्ज हमने खाया था,उनका बाकी हम चुकाने आये हैं।और जिन्होंने हमारा कर्ज खाया था,उनसे हम अपना हक पाने आये हैं। लेन-देन का व्यापार अभी लंबा चलेगा।जीवन अभी कई बार पैदा होगाऔर कई बार जलेगा। और लेन-देन का सारा व्यापारजब चुक जायेगा,ईश्वर हमसे खुद कहेगा – तुम्हारा एक पावना… Continue reading लेन-देन – रामधारी सिंह ‘दिनकर’

दिमाग का लोच्या — अल्फ़ाज़ में नुमायाँ वज़ूद © RockShayar Irfan Ali Khan

इंसानी खोपड़ी भी क्या कमाल की चीज है दिमाग को सुरक्षित रखती, ये वो चीज है मात्र 29 हड्डियों से अपुन की खुपड़ियां बनी हैं 8 कपाल से, 14 चेहरे से, 6 कान से जुड़ी हैं कपाल में ही तो छुपा असली माल है साला 1400 ग्राम का दिमाग़, मचाता कितना बवाल है खरबों न्यूरॉन्स […]… Continue reading दिमाग का लोच्या — अल्फ़ाज़ में नुमायाँ वज़ूद © RockShayar Irfan Ali Khan

कुछ ढ़ूँढ़ता हूँ मैं. — सच्चिदानन्द सिन्हा

तन्हा कभी जब बैठ गुमसुम, सोंचता हूँ मैं । सदियों पुराने गाँव में, कुछ ढूँढ़ता हूँ मैं ।। अपने गाँव की गलियां, कीचड़ से भरे नाले। मिट्टी की बनी दीवार को ,भी ढूँढ़ता हूँ मैं ।। घर के सामने बैठी, गोबर सानती दादी । उपले थापती दीवार पर भी, देखता हूँ मैं ।। स्नेह से […]… Continue reading कुछ ढ़ूँढ़ता हूँ मैं. — सच्चिदानन्द सिन्हा

“मैं बन जाता हूँ हर रोज़ एक इंसान नया” — अल्फ़ाज़ में नुमायाँ वज़ूद © RockShayar Irfan Ali Khan

दिल में उठता है हर रोज़ एक तूफान नया मैं बन जाता हूँ हर रोज़ एक इंसान नया। रातभर आँखें जागकर काम करती रहती हैं तब तामीर होता है ख़्वाबों का एक जहान नया।। via “मैं बन जाता हूँ हर रोज़ एक इंसान नया” — अल्फ़ाज़ में नुमायाँ वज़ूद © RockShayar Irfan Ali Khan

झुकी झुकी सी नजर – कैफि आजमी

झुकी झुकी सी नज़र बेक़रार है कि नहीं दबा दबा सा सही दिल में प्यार है कि नहीं तू अपने दिल की जवाँ धड़कनों को गिन के बता मेरी तरह तेरा दिल बेक़रार है कि नहीं वो पल के जिस में मुहब्बत जवान होती है उस एक पल का तुझे इंतज़ार है कि नहीं तेरी… Continue reading झुकी झुकी सी नजर – कैफि आजमी