क्या करूँ संवेदना लेकर तुम्हारी?

  क्या करूँ संवेदना लेकर तुम्हारी? क्या करूँ? मैं दुखी जब-जब हुआ संवेदना तुमने दिखाई, मैं कृतज्ञ हुआ हमेशा, रीति दोनो ने निभाई, किन्तु इस आभार का अब हो उठा है बोझ भारी; क्या करूँ संवेदना लेकर तुम्हारी? क्या करूँ? एक भी उच्छ्वास मेरा हो सका किस दिन तुम्हारा? उस नयन से बह सकी कब… Continue reading क्या करूँ संवेदना लेकर तुम्हारी?

तब रोक न पाया मैं आंसू – हरिवंशराय बच्चन

जिसके पीछे पागल होकर मैं दौडा अपने जीवन-भर, जब मृगजल में परिवर्तित हो मुझ पर मेरा अरमान हंसा! तब रोक न पाया मैं आंसू! जिसमें अपने प्राणों को भर कर देना चाहा अजर-अमर, जब विस्मृति के पीछे छिपकर मुझ पर वह मेरा गान हंसा! तब रोक न पाया मैं आंसू! मेरे पूजन-आराधन को मेरे सम्पूर्ण… Continue reading तब रोक न पाया मैं आंसू – हरिवंशराय बच्चन

रीढ़ की हड्डी – हरिवंशराय बच्चन

मैं हूँ उनके साथ,खड़ी जो सीधी रखते अपनी रीढ़ कभी नही जो तज सकते हैं, अपना न्यायोचित अधिकार कभी नही जो सह सकते हैं, शीश नवाकर अत्याचार एक अकेले हों, या उनके साथ खड़ी हो भारी भीड़ मैं हूँ उनके साथ, खड़ी जो सीधी रखते अपनी रीढ़ निर्भय होकर घोषित करते, जो अपने उदगार विचार… Continue reading रीढ़ की हड्डी – हरिवंशराय बच्चन

क्यों जीता हूँ

आधे से ज़्यादा जीवन जी चुकने पर मैं सोच रहा हूँ- क्यों जीता हूँ? लेकिन एक सवाल अहम इससे भी ज़्यादा, क्यों मैं ऎसा सोच रहा हूँ? संभवत: इसलिए कि जीवन कर्म नहीं है अब चिंतन है, काव्य नहीं है अब दर्शन है। जबकि परीक्षाएँ देनी थीं विजय प्राप्त करनी थी अजया के तन मन… Continue reading क्यों जीता हूँ