हम देखेंगे

फैज अहमद फैज फैज अहमद फैज यांची ही रचना. कानपूरच्या आयआयटीमधील विद्यार्थ्यांनी ही रचना सीएए कायद्याच्या विरोधात होत असलेल्या प्रदर्शनामध्ये गायली. त्यानंतर काहींनी या गाण्याला हिंदूविरोधी ठरवून त्याबद्दल तक्रार केली. सध्या या तक्रारीचा अभ्यास करण्यासाठी कमिटी बसलेली आहे. प्रत्यक्षात फैज यांनी ही कविता लिहली पाकीस्तानचे हुकुमशहा झिया यांच्या दडपशाही आणि धर्मांध धोरणांविरोधात. झियांनी त्यांना तुरुंगात… Continue reading हम देखेंगे

Blood ( लहू) – गालिब

रगोमें दौडते फिरने के हम नही कायलआँखोंसे न टपका तो लहू क्या है धमन्यांमधून नुसते दौडत, फिरत राहण्याची आम्हाला हौस नाही, जर एखाद्याचे दु:ख पाहून आमच्या डोळ्यात पाणी आले नाही तर या (सळसळणाऱ्या) रक्ताचा काय उपयोग -- We do not have the temptation to move around in the arteries, if we do not have tears… Continue reading Blood ( लहू) – गालिब

Last wish – आखरी इच्छा

कागा सब तन खाईयोचुन चुन के खाईयो मांसपर दो आँखे मत खाईयोमुझे पिया मिलन की आंस Crow, eat my (fallen) body. Kill all the meat with a toe. But do not eat my eyes. Because I am (still in this state) hoping to see the beloved ( God).

लाई फिर इक लग़्ज़िशे-मस्ताना तेरे शहर में – कैफ़ि आज़मी

कैफ़ि आज़मीउर्दू शायरी,कैफ़ि आज़मी April 26, 2019 0 Minutes लाई फिर इक लग़्ज़िशे-मस्ताना तेरे शहर में ।फिर बनेंगी मस्जिदें मयख़ाना तेरे शहर में । आज फिर टूटेंगी तेरे घर की नाज़ुक खिड़कियाँआज फिर देखा गया दीवाना तेरे शहर में । जुर्म है तेरी गली से सर झुकाकर लौटनाकुफ़्र है पथराव से घबराना तेरे शहर में । शाहनामे लिक्खे हैं खंडरात… Continue reading लाई फिर इक लग़्ज़िशे-मस्ताना तेरे शहर में – कैफ़ि आज़मी

बेघर – जावेद अख़्तर

15h ago जावेद अख़्तरहिंदीहिंदी कविताहिंदी साहित्य शाम होने को हैलाल सूरज समंदर में खोने को हैऔर उसके परेकुछ परिन्‍देक़तारें बनाएउन्‍हीं जंगलों को चलेजिनके पेड़ों की शाख़ों पे हैं घोंसलेये परिन्‍देवहीं लौट कर जाएँगेऔर सो जाएँगेहम ही हैरान हैंइस मकानों के जंगल मेंअपना कहीं भी ठिकाना नहींशाम होने को हैहम कहाँ जाएँगे        … Continue reading बेघर – जावेद अख़्तर