बेघर – जावेद अख़्तर

15h ago जावेद अख़्तरहिंदीहिंदी कविताहिंदी साहित्य शाम होने को हैलाल सूरज समंदर में खोने को हैऔर उसके परेकुछ परिन्‍देक़तारें बनाएउन्‍हीं जंगलों को चलेजिनके पेड़ों की शाख़ों पे हैं घोंसलेये परिन्‍देवहीं लौट कर जाएँगेऔर सो जाएँगेहम ही हैरान हैंइस मकानों के जंगल मेंअपना कहीं भी ठिकाना नहींशाम होने को हैहम कहाँ जाएँगे        … Continue reading बेघर – जावेद अख़्तर