कारण

कधीपासून शोधतोय वाटत कधीतरी होत माझ्याकडे पण आता हरवलय जगण्यासाठी एक कारण सगळीकडे शोधून झाल कुणाच्यातरी प्रेमात बायकामुलात, गाडी बंगल्यात आणि जमीन-जुमल्यातही जगण्यासाठी एक कारण तुम्हाला म्हणून सांगतो शोधल दारुच्या ग्लासातही मित्रांबरोबरच्या पार्ट्यातही आणि फक्त रात्री रंगीत होणाऱ्या गल्ल्यातही जगण्यासाठी एक कारण बाबा बुवांच्या मठात, मंदिर, मशीर, चर्चमध्ये धर्मग्रंथांच्या पानामध्ये जगण्यासाठी एक कारण आसपासचे चेहरे… Continue reading कारण

तो येईल

माहीत नाही तो कधी येईल पण माहीत आहे कधीतरी नक्की येईल रस्त्यावरच्या एखाद्या गाडीच रुप धरुन येईल कि येईल हातात भलामोठा चाकु किंवा सुरा घेऊन हद्यात कळ येऊन संपेल का सगळ अचानक कि बघावी लागेल त्याची वाट वर्षानुवर्षे शिणलेल्या देहाने माहित नाही त्याच्या डोळ्यात डोळे घालुन बघता येईल का थोडावेळ तरी मारता येईल का त्याला… Continue reading तो येईल

देश को देश ही रहने दो…

March 24, 2019 by Manju Mishra      .. देश मेरी तुम्हारी या किसी की जागीर नहीं है देश कागज पर कोई खींचीं हुई लकीर नहीं है  देश न ही कुछ मुट्ठी भर लोगों की विरासत है देश न ही केवल और केवल बस सियासत है .. देश वो मिटटी है जो गढ़ती है हमें रचती है  देश वो खुश्बू है जो… Continue reading देश को देश ही रहने दो…

साँझ हुई परदेस में – विकाश कुमार

VIKASH KUMARअतिथि लेखक,उर्दू शायरी,हिंदी कविताएँ February 11, 2019 0 Minutes फ़रवरी 2019 में न्यू यॉर्क के एक होटेल के कमरे से मैंने ज़िंदगी की जदोजहद को शब्दों में पिरोने की कोशिश की । आशा है आपको पसंद आएगी ।  साँझ हुई परदेस मेंदिल देश में डूब गयाअब इस भागदौड़ सेजी अपना ऊब गया वरदान मिलने की चाह… Continue reading साँझ हुई परदेस में – विकाश कुमार

ये सड़कें – ज्ञान प्रकाश सिंह

2 नव कविबाल कविताएँहिंदीहिंदी कविता अट्ठाइस चक्के वाले ट्रकचलते सड़कों के सीने परएक साथ बहुतेरे आतेहैं दहाड़तेरौंदा करतेतब चिल्लाती हैं ये सड़केंऔर कभी जबअट्ठहास करते बुलडोजरदौड़ लगाते उनके ऊपरतब चीखा करती हैं सड़केंकितना सहती हैंये सड़कें।X X Xसड़क किनारे रहने वालेएवंयात्रा करने वालेसड़ी गली मलयुक्त गन्दगीकरते रहते हैं सड़कों परऔर जानवरकरते गोबरमैला भर देते हैं… Continue reading ये सड़कें – ज्ञान प्रकाश सिंह

दिमाग का लोच्या — अल्फ़ाज़ में नुमायाँ वज़ूद © RockShayar Irfan Ali Khan

इंसानी खोपड़ी भी क्या कमाल की चीज है दिमाग को सुरक्षित रखती, ये वो चीज है मात्र 29 हड्डियों से अपुन की खुपड़ियां बनी हैं 8 कपाल से, 14 चेहरे से, 6 कान से जुड़ी हैं कपाल में ही तो छुपा असली माल है साला 1400 ग्राम का दिमाग़, मचाता कितना बवाल है खरबों न्यूरॉन्स […]… Continue reading दिमाग का लोच्या — अल्फ़ाज़ में नुमायाँ वज़ूद © RockShayar Irfan Ali Khan

कुछ ढ़ूँढ़ता हूँ मैं. — सच्चिदानन्द सिन्हा

तन्हा कभी जब बैठ गुमसुम, सोंचता हूँ मैं । सदियों पुराने गाँव में, कुछ ढूँढ़ता हूँ मैं ।। अपने गाँव की गलियां, कीचड़ से भरे नाले। मिट्टी की बनी दीवार को ,भी ढूँढ़ता हूँ मैं ।। घर के सामने बैठी, गोबर सानती दादी । उपले थापती दीवार पर भी, देखता हूँ मैं ।। स्नेह से […]… Continue reading कुछ ढ़ूँढ़ता हूँ मैं. — सच्चिदानन्द सिन्हा

झुकी झुकी सी नजर – कैफि आजमी

झुकी झुकी सी नज़र बेक़रार है कि नहीं दबा दबा सा सही दिल में प्यार है कि नहीं तू अपने दिल की जवाँ धड़कनों को गिन के बता मेरी तरह तेरा दिल बेक़रार है कि नहीं वो पल के जिस में मुहब्बत जवान होती है उस एक पल का तुझे इंतज़ार है कि नहीं तेरी… Continue reading झुकी झुकी सी नजर – कैफि आजमी

आप धीरे धीरे मरने लगते हैं जब…/ You start dying slowly… —

आप धीरे धीरे मरने लगते हैं, जब आप- करते नहीं कोई यात्रा, पढ़ते नहीं कोई किताब, सुनते नहीं जीवन की ध्वनियाँ, करते नहीं किसी की तारीफ। आप धीरे धीरे मरने लगते हैं, जब आप- मार डालते हैं अपना स्वाभिमान, नहीं करने देते किसी को मदद अपनी और न ही करते हैं मदद दूसरों की। आप… Continue reading आप धीरे धीरे मरने लगते हैं जब…/ You start dying slowly… —