जनता देखती पर चुप रहा करती.

आज के दिनों के लिये सही है

सच्चिदानन्द सिन्हा

रुधिर तो खौलता रहता ,मुख से कुछ नहीं कहता ।
सुनाना चाहता भी तब ,नहीं कोई सुना करता।।

बारूद का गोला , कभी जब फूट पड़ता है ।
धधकती अग्नि बन शोले ,कवच को तोड़ देता है।।

बैलेट जब निकलते हैं , दिग्गज डोल हैं जाते।
कुर्सी घिसक उनकी, जमीं पर है नजर आते ।।

अचानक आसमा्ँ से गिर,जमीं पर आ तभी जते।
उनका ताज तत्तक्षण ही सर से उतर जाते ।।

आम सा एक नागरिक, बन तभी जाते ।
मुफ्त मे ऐश करते थे , वे सब कुछ चले जाते।।

नशा जब तख्त का उनका ,टूटकर दूर हो जाता ।
कुछ चाल मस्तिष्क फिर नया,कुछ ढ़ूँढ़ है लेता ।।

मकसद सिर्फ है उनका ,गद्दी को पकड़ रखना ।
जनता भाँड़ में जाये ,मतलब क्यों भला रखना ।।

अगला फिर समय आये ,शगूफा फिर निकालेगें ।
चतुर होते बडे खुद ये ,नया फिर कुछ निकालेगें ।।

पता है खूब इनको…

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