झुकी झुकी सी नजर – कैफि आजमी


झुकी झुकी सी नज़र बेक़रार है कि नहीं दबा दबा सा सही दिल में प्यार है कि नहीं तू अपने दिल की जवाँ धड़कनों को गिन के बता मेरी तरह तेरा दिल बेक़रार है कि नहीं वो पल के जिस में मुहब्बत जवान होती है उस एक पल का तुझे इंतज़ार है कि नहीं तेरी… Continue reading झुकी झुकी सी नजर – कैफि आजमी

आप धीरे धीरे मरने लगते हैं जब…/ You start dying slowly… —


आप धीरे धीरे मरने लगते हैं, जब आप- करते नहीं कोई यात्रा, पढ़ते नहीं कोई किताब, सुनते नहीं जीवन की ध्वनियाँ, करते नहीं किसी की तारीफ। आप धीरे धीरे मरने लगते हैं, जब आप- मार डालते हैं अपना स्वाभिमान, नहीं करने देते किसी को मदद अपनी और न ही करते हैं मदद दूसरों की। आप… Continue reading आप धीरे धीरे मरने लगते हैं जब…/ You start dying slowly… —

हमें रास्ते फिर बुलाने लगे: — Sahajach’s Blog


दरियाओं की नज़्र हुए धीरे धीरे सब तैराक काही शेर स्तब्ध करतात, हा त्यातलाच एक. वाटतं, हे शब्द लिहिण्यापूर्वी नेमकं कोण आठवलं असावं या शायरला. की हे त्याच्या स्वत:च्या अनुभवातून आलेलं शहाणपण… प्रवाहाच्या विरुद्ध पोहून दमल्या थकल्यानंतर किंवा त्या एकूणच प्रयत्नांचा फोलपणा जाणवून केव्हातरी याने स्वत:ला प्रवाहात सोडून दिलय. तिथे फार काही करावे लागत नाही… […]… Continue reading हमें रास्ते फिर बुलाने लगे: — Sahajach’s Blog

हम उन्हें वो हमें भुला बैठे – ख़ुमार बाराबंकवी


हम उन्हें वो हमें भुला बैठे दो गुनहगार ज़हर खा बैठे हाल-ऐ-ग़म कह-कह के ग़म बढ़ा बैठे तीर मारे थे तीर खा बैठे आंधियो जाओ अब आराम करो हम ख़ुद अपना दिया बुझा बैठे जी तो हल्का हुआ मगर यारो रो के हम लुत्फ़-ऐ-गम बढ़ा बैठे बेसहारों का हौसला ही क्या घर में घबराए दर… Continue reading हम उन्हें वो हमें भुला बैठे – ख़ुमार बाराबंकवी

हम हैं सूरज-चाँद-सितारे – द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी 6h ago


हम हैं सूरज-चाँद-सितारे।। हम नन्हे-नन्हे बालक हैं, जैसे नन्हे-नन्हे रजकण। हम नन्हे-नन्हे बालक हैं, जैसे नन्हे-नन्हे जल-कण। लेकिन हम नन्हे रजकण ही, हैं विशाल पर्वत बन जाते। हम नन्हे जलकण ही, हैं विशाल सागर बन जाते। हमें चाहिए सिर्फ इशारे। हम हैं सूरज-चाँद-सितारे।। हैं हम बच्चों की दुनिया ही, एक अजीब-गरीब निराली। हर सूरत मूरत… Continue reading हम हैं सूरज-चाँद-सितारे – द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी 6h ago

ड्युसलडॉर्फ डायरीज्-१ — आनंदयात्री, मी आनंदयात्री!


ड्युसलडॉर्फमध्ये प्रवेश करता क्षणी डार्मश्टाटच्या तुलनेत हे बरंच मोठं शहर आहे हे लक्षात आलं! वेगवेगळ्या देशातून आलेल्या मंडळींबरोबर, त्यांच्या देशातल्या वेगवेगळ्या गोष्टी ऐकत आणि ड्युसलडॉर्फ मधल्याच शिक्षिकेबरोबर, तिच्याकडून तिच्या लहानपणच्या अनेक गोष्टी ऐकत ड्युसलडॉर्फ पाहणं हा वेगळाच अनुभव होता. या शहराचं हे तयार झालेलं हे पहिलं इम्प्रेशन फार विशेष आणि वेगळं आहे हे नक्की! via ड्युसलडॉर्फ… Continue reading ड्युसलडॉर्फ डायरीज्-१ — आनंदयात्री, मी आनंदयात्री!

 पुणे 1790-95 — अक्षरधूळ


(ईस्ट इंडिया कंपनीच्या सेवेत असलेले एक ब्रिटिश अधिकारी सर जेम्स डग्लस (1826-1904) यांनी मुंबई, जवळपासची स्थळे आणि तत्कालीन परिस्थिती याबाबत अनेक लेख लिहिले होते. या लेखांचे संकलन करून त्यांनी आपली पुस्तकेही नंतर प्रसिद्ध केली होती. या लेखांमधील त्यांचा सर चार्लस मॅलेट यांच्याबद्दलचा लेख चाळत असताना मला त्यात 1792 मधल्या पुण्याचे हे वर्णन सापडले. संपूर्ण लेखाचा […]… Continue reading  पुणे 1790-95 — अक्षरधूळ

उठो द्रौपदी — The REKHA SAHAY Corner!


उठो द्रौपदी वस्त्र संम्भालो अब गोविन्द न आयेंगे। कब तक आस लगाओगी तुम बिके.. हुए अखबारों से। कैसी रक्षा मांग रही हो दु:शासन…. दरबारों से। स्वंय… जो लज्जाहीन पड़े हैं वे क्या लाज बचायेंगे। उठो द्रौपदी वस्त्र संम्भालो अब गोविन्द न आयेंगे।Il१॥ कल तक केवल अंधा राजा अब गूंगा बहरा भी है। होंठ सिल दिये […]… Continue reading उठो द्रौपदी — The REKHA SAHAY Corner!